9 May 2026 | By Maitreya Maheshkumar Khake | 4 min read आज के समय में प्रत्येक मानव जीवन की जटिलताओं से परेशान एवं भावी जीवन की असुरक्षाओं से विचलित है। ऐसी अवस्था में ज्योतिषीय ज्ञान ही भविष्य की राह में मार्ग दर्शन कर सकता है। वस्तुतः अन्य विभिन्न विषयों जैसे हस्त विज्ञान, सामुद्रिक विज्ञान, विज्ञान और अंग विज्ञान आदि भी मार्ग दर्शन करते आये हैं, परन्तु जितना गणितीय सूक्ष्म अध्ययन एवं तार्किक स्पष्टीकरण ज्योतिष शास्त्र में सम्भव है आज के समय में अन्य किसी भी शास्त्र में सम्भव नहीं है।ज्योतिष शास्त्र के अन्तर्गत सम्पूर्ण ब्रह्माण्ीय स्थिति एवं उसमें उपस्थित ऊर्जाओं का अध्ययन किया जाता है, इन ऊर्जाओं का सम्पूर्ण जड़ एवं चेतन जगत पर सदैव प्रभाव विद्यमान रहता है। ज्योतिषीय गणना के अन्तर्गत सम्पूर्ण 27 (सत्ताइस) नक्षत्रों में 108 (एक सौ आठ) पद होते हैं। जिनमें सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का समावेश है और प्रत्येक प्राणी का पद इन्हीं में से एक होता है। ऐसे में यदि कोई भी जीव अपने इष्ट को स्मरण करते हुए 108 मनकों द्वारा प्रार्थना करता है तो व्यक्ति विशेष का तो भला होता ही है साथ ही वह व्यक्ति सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की भी कामना कर लेता है।वैदिक काल में ज्योतिष का एकमात्र मुख्य उद्देश्य अपने कर्म बंधन को पूर्ण करते हुए मोक्ष की ओर अपने जीवन मार्ग को प्रशस्त करने की कोशिश करना था, परन्तु वर्तमान समय में ज्योतिषीय गणना का प्रयोग अपनी सुख-सुविधाओं की प्राप्ति और उत्तरदायित्व की पूर्ति हेतु किया जा रहा है। वर्तमान में सभी ज्योतिषियों का कर्त्तव्य है कि ज्योतिषीय गणना का उचित प्रयोग करते हुए सही मार्ग-दर्शन करें एवं सत्कर्म करने के लिये प्रोत्साहित करें।
ज्योतिष वेद का नेत्र है तथा फलित ज्योतिष उस नेत्र की ज्योति है। इस अध्ययन ज्ञान को एवं इस ज्योति को जानने वाले को ज्योतिषी कहा जाता है। इसीलिये ज्योतिषी को दैवज्ञ भी कहा जाता है।वेदों के मुख्य रूप से छ: प्रमुख अंग माने गये हैं:शिक्षा — नासिकाछन्द — पैरव्याकरण — मुखनिरुक्त — कानकल्प — हाथज्योतिष — नेत्रविस्तृत विवरण:1. शिक्षा:- वेदों के उच्चारण की सही शिक्षा। इसे वेदों की नासिका कहा जाता है क्योंकि जिस प्रकार नासिका के द्वारा ली जाने वाली श्वाँस के द्वारा ही कोई व्यक्ति जीवित रह सकता है उसी प्रकार शिक्षा को प्राप्त किये बिना कोई व्यक्ति न तो जीवन यापन कर सकता है और न ही जीवित रह सकता है।2. छन्द:- छन्द के अंतर्गत वेदों की जाति एवं भेदों का विस्तृत अध्ययन किया जाता है। इन्हें वेदों के पैर कहा जाता है क्योंकि जिस प्रकार कोई व्यक्ति पैरों के न होने पर कहीं भी आना-जाना नहीं कर सकता है और कार्य नहीं कर सकता इसी प्रकार छन्द के बिना वेदों को व्यवस्थित नहीं किया जा सकता।3. व्याकरण:- वेदों के अर्थ और प्रयोग में संलग्न किये जाने वाले शब्दों को विभिन्न अलंकार एवं सभी व्याकरण के अंतर्गत आने वाली क्रियाओं के द्वारा नियमानुसार व्यवस्थित करना ही व्याकरण कहलाता है।
इसे वेदों का मुख कहा जाता है क्योंकि जिस प्रकार कोई व्यक्ति मुख के द्वारा अपने अधिकांश कार्यों की पूर्ति बोलकर करता है उसी प्रकार व्याकरण विभिन्न शब्दों को तैयार करके कार्य करने के लिये प्रस्तुत करता है।4. निरुक्त: — वेदों के शब्द कोश को निरुक्त कहा जाता है। इन्हें वेदों के कान (कर्ण) कहा जाता है क्योंकि जिस प्रकार कोई व्यक्ति कानों के बिना सुन नहीं सकता और कार्य करने में समर्थ नहीं हो पाता इसी प्रकार इन शब्दों के कोश के अभाव में वेदों का सही और उचित प्रस्तुतीकरण संभव नहीं है। इसी के द्वारा वेदों के अस्तित्व को बनाया गया है।5. कल्प: — यज्ञ (यज्ञ) करने की विधि को कल्प कहा जाता है। इसे सामान्य भाषा में हवन कहा जाता है। इसके द्वारा वेदों का मौखिक प्रस्तुतीकरण (Practical) संभव होता है। इसे वेदों के हाथ कहा जाता है क्योंकि कोई व्यक्ति क्रियात्मक कार्यों को तब तक पूर्ण करने में असमर्थ रहता है जब तक कि उसके हाथ न हो।6. ज्योतिष: — ग्रहों एवं नक्षत्रों की स्थिति, दिशा, गति तथा परस्पर ग्रहों के संबंधों के अध्ययन द्वारा किसी के (व्यक्तिगत या सामाजिक सभी प्रकार) संबंध या उसके स्वभाव से अवगत होना और स्थिति का पूर्वानुमान लगाना ही ज्योतिष है, इन्हें वेदों की आँख कहा जाता है। क्योंकि ज्योतिष के अंतर्गत विभिन्न ग्रहों की स्थिति अनुसार तर्क प्रस्तुत करते हैं, उसी प्रकार जिस प्रकार कोई व्यक्ति आँखों के द्वारा सामने के दृश्यों को देख व समझ सकता है।